कांग्रेसी कहकर शिवराज सरकार ने 3 लाख लोगों को काम से निकाला, 8 को भोपाल पहुंचकर कमलनाथ सरकार से मांगेंगे न्याय

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TOC NEWS @ www.tocnews.org

15 साल तक सरकार में रही भाजपा और उसके मुख्यमत्री शिवराज सिंह ने बीते कुछ ही सालों में 3 लाख से अधिक युवाओं को नौकरी से निकाल दिया है, जिन्हें नौकरी से निकाला गया है, उन्हें 2003 से पहले प्रदेश के विभिन्न विभागों में दिग्विजय सिंह सरकार ने नौकरी पर लगाया था। इसी दौर में शिवराज सिंह की सरकार ने जो नौकरी दी है, उसमें न तो मानदेय की गारंटी है और न ही नौकरी में स्थायित्व यानि युवाओं के साथ शिवराज सिंहकी सरकार ने गुलामों जैसा वर्ताव किया है,

जिससे मुक्ति मांग को लेकर 8 मार्च को लाखों की संख्या में छोटे कर्मचारी भोपाल में शाहजानी पार्क में एकत्रित होंगे और कमलनाथ सरकार से नौकरी वापस मांगने, नौकरी में स्थायित्व एवं जिंदा रहने लायक न्यूनतम वेतन की मांग करेंगे। शाहजानी पार्क में होने वाले इस ऐतिहासिक सम्मेलन में जनसंपर्क मंत्री पी सी शर्माजी सहित कुछ और मंत्री भी उपस्थित रहेंगे, जो गैरमान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों से जुड़े कर्मचारियों की पीड़ा सुनेंगे और उनका मांर्गदर्शन करेंगे। शिवराज सिंह सरकार ने जिन्हें नौकरी से निकाला है उनमें एमपीईबी में काम करने वाले मीटर वाचक, ग्रामीण क्षेत्रों के संविदा प्रेरक, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाले स्वास्थ्य जनरक्षक, पशुओं को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाले गौसेवकों सहित अलग-अलग परियोजनाओं में 18-20 साल से काम करने वाले कर्मचारी शामिल हैं।

15 साल में शिवराज सरकार ने जिन्हें नौकरी दी है, उस नौकरी में न तो निश्चिंतता है और न ही उन्हें जिंदा रहने लायक वेतन मिलता है, ऐसे कर्मचारियों में सबसे बुरी स्थिति में अलग-अलग विभागों में काम करने वाले कंप्यूटर आपरेटर हैं, जिनसे काम तो 10-12 घंटे लिया जाता है, लेकिन वेतन के नाम पर 3 से 5 हजार रुपए भी नहीं दिए जाते। कंप्यूटर आपरेटर सरकार के वे कर्मचारी हैं, जिनकी दम पर देश डिजिटल हुआ है और खुद प्रधानमंत्री इस डिजिटिलाईजेशन पर गर्व करते हैं, कितने अफसोस की बात है कि जिन कंप्यूटर आपरेटरों के पास सरकार का सारा रिकार्ड है, वे खुद सरकारी रिकार्ड में उनके कर्मचारी नहीं हैं। स्कूलों में बच्चों को शिक्षा देने वाले अतिथि शिक्षकों की स्थिति और भी खराब है, जिन्हें मिनटों के हिसाब से मानदेय दिए जाने की व्यवस्था शिवराज सरकार ने की है, यह ऐसी व्यवस्था है जो दुनिया के किसी भी देश या राज्य में शायद ही लागू हो।

अतिथि शिक्षकों की जो व्यवस्था पूर्व की सरकार ने बनाई है, वह शिवराज सरकार पर सबसे बड़ा धब्बा है, जिसमें अतिथि को नौकरी पर 6 महीने के लिए रखा जाता है और निकाल दिया जाता है और समय पर तय न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है, इस व्यवस्था के जरिए हर साल 50 हजार अतिथि शिक्षको को निकाल दिया जाता है, जिनकी संख्या इस समय प्रदेश में 2 लाख से अधिक हो चुकी है। दिग्विजय सिंह सरकार ने 50 हजार विद्युतकर्मी 2001 में रखे थे, जिन्हें धीर-धीरे करके नौकरी से निकाल दिया या फिर ठेकेदारों के हवाले कर दिया है, इनकी नौकरी में भी स्थायित्व और वेतन दोनों नहीं हैं। कालेजों में पढ़ाने वाले अतिथि विद्वानों से भी शिवराज सिंह की सरकार मजदूरों जैसा सलूक करती आई है, यह प्रदेश की बौद्धिक संपदा का शोषण है, जो सिर्फ मप्र में ही हुआ है।

शिवराज सिंह सरकार ने काम पर लगे युवाओं के साथ यह बर्बरता कर्मी कल्चर समाप्त करने के नाम पर की है। कर्मी कल्चर को कोसने वाली शिवराज सरकार ने जो अतिथि या संविदा व्यवस्था लागू की है, वह आदिम काल की याद दिलाने वाली है। शिवराज सिंह सरकार ने नौकरी की जो व्यवस्था की बनाई है, उसमें सिर्फ उतना ही मानदेय मिलता है, जिसमें व्यक्ति जिंदा भी मुश्किल से रह सके। मप्र में भाजपा सरकार ने सबसे अधिक शोषण पढ़े लिखे युवाओं का किया है, जिनसे काम तो कराया गया है, लेकिन काम की गारंटी और वेतन नहीं दिया गया है। यह सब बताने के लिए ही 8 मार्च को प्रदेश के कौने-कौने से विभिन्न विभागों में काम करने वाले 1 लाख से अधिक कर्मचारी एकजुट हो कर कमलनाथ सरकार से न्याय मांगेंगे।

इससे भी अधिक हैरान करने वाली बात यह है कि एक तरफ शिवराज सिंह की सरकार ने चुन-चुन कर दिग्विजय सिंह सरकार के समय नौकरी पर रखे गए लोगों को काम से निकाला है वहीं दूसरी तरफ भाजपा, आरएसएस से जुड़े लोगों को स्थाई और भारी भरकम वेतन वाली नौकरियां बांटी हैं। जो भाजपा समर्थक संविदाकर्मी रखे गए थे, उन्हें न सिर्फ नियमित किया गया है बल्कि सरकारी कर्मचारी का दर्जा देकर भारी भरकम वेतन दिया जा रहा है। हजारों ऐसे लोगों को अध्यापक बना दिया गया, जो इसके लिए पात्र तक नहीं हैं।

10 हजार से अधिक लोगों को फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के जरिए शिक्षा विभाग में नौकरी दे दी गई, जिनका खुलासा अध्यापकों की संविलियन की प्रक्रिया के दौरान हुआ। वहीं 1995 से काम कर रहे शिक्षाकर्मी जो अब अध्यापक हैं और वे पुरानी पेंशन और सरकारी कर्मचारी की तरह वेतन भत्तों के हकदार हैं, उनकी 2007 में पुर्ननियुक्ति करके कई हक और अधिखारों से वंचित कर दिया गया है। शिवराज सरकार की इस मनमानी और बर्बरतापूर्ण कार्रवाईयों के खिलाफ पहली बार छोटा कर्मचारी गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी महासंघ बनाकर एकजुट हुआ है और कमलनाथ सरकार से न्याय मांगने आ रहा है।

वासुदेव शर्मा
संयोजक, गैर मान्यता प्राप्त कर्मचारी महासंघ, मध्यप्रदेश


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