एल्कलाइन पानी यानी हैण्डपम्प का साफ़ पानी : लेकिन कैंसर उससे भी नहीं रुकता

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ANI NEWS INDIA @ http://aninewsindia.com

ब्यूरो चीफ नागदा, जिला उज्जैन // विष्णु शर्मा 8305895567

आदित्य बिरला हायर सेकेंड्री स्कूल के रसायन शास्त्र के शिक्षक श्री धर्मेन्द्र गान्धी जी के कथनानुसार-

एल्कलाइन पानी आजकल प्रचलन में आया हुआ है। उदासीनता अब निष्क्रियता जान पड़ने लगी है , इसलिए उसमें एक चुटकी क्षारीयता मिलानी ज़रूरी है।

एल्कली शब्द अरबी भाषा के ‘अल-क़ली’ से बना है। ‘क़ली’ कैल्शियम ऑक्साइड यानी चूने को कहते हैं और यह पानी के सम्पर्क में आकर क्षार का निर्माण करता है।

कई लेखों में यह प्रचलित किया जा रहा है कि नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक ऑटो वॉरबर्ग ने यह सिद्ध किया था कि कैंसर की कोशिकाएँ ऑक्सीजन की प्रचुरता और एल्कलाइन ( अर्थात् क्षारीय ) माहौल में मर जाती हैं। इंटरनेट पर एल्कलाइन पानी के बहुप्रचलित झूठ की शुरुआत दरअसल यहीं से होती है।

वॉरबर्ग ने दरअसल यह सिद्ध किया ही नहीं था। उन्होंने तो वस्तुतः यह बताया था कि ऑक्सीजन की उपस्थिति होने के बावजूद कैंसर-कोशिकाएँ बिना उसके इस्तेमाल के अपने लिए ऊर्जा पैदा करती और कर सकती हैं। यह प्रक्रिया किण्वन या फ़र्मेन्टेशन कहलाती है और वॉरबर्ग के नाम पर इसे वॉरबर्ग-प्रभाव नाम दिया है।

वॉरबर्ग की इस बात को लोगों ने अनजाने में या जानबूझ कर उलट दिया। उन्होंने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि कैंसर-कोशिकाएँ ऑक्सीजन की कमी और दैहिक अम्लीयता का नतीजा हैं। जिस आदमी का शरीर जितना अम्लीय , उसे कैंसर होने का उतना ही ख़तरा।

फिर भ्रम फैलाये गये कि मनुष्य का आहार अम्लीय हो चला है। जिस कारण शरीर में अम्लीयता बढ़ती जा रही है। अम्लीय भोजन से रक्त में अम्लीयता में वृद्धि हो रही है और इसी लिए कैंसर का प्रचलन भी बढ़ रहा है।

आपको यह बात जाननी चाहिए कि मानव-रक्त थोड़ा सा क्षारीय ( एल्केलाइन ) होता है। शरीर रक्त की पीएच को , जो कि अम्लीयता-क्षारीयता को नापने का एक पैमाना है , उसे एक सँकरी रेंज में बनाए रखता है। पीएच गिरी तो अम्लीयता बढ़ी। पीएच उठी तो क्षारीयता बढ़ी। दोनों ही हालत में इंसान की मौत तय।

अम्लीयता-क्षारीयता को सन्तुलित रखने का यह काम मुख्यतः दो अंग करते हैं : वृक्क और फेफड़े। लेकिन कभीकभी बीमारियों के फलस्वरूप रक्त का पीएच सचमुच गड़बड़ा जाता है और उसमें अम्लीयता यानी एसिडोसिस या क्षारीयता यानी एल्केलोसिस प्रकट हो जाती है।

यह सच है कि वॉरबर्ग के कथनानुसार कैंसर-कोशिकाएँ जब ग्लूकोज़ से बिना ऑक्सीजन के ऊर्जा पैदा करती हैं , तो उनके आसपास का माहौल अम्लीय हो जाता है। लेकिन इससे आप यह नतीजा हरगिज़ नहीं निकाल सकते कि यह अम्लीयता पूरे शरीर में व्याप्त है।

आपके शरीर में हर अंग का पीएच अलग-अलग है। लार अम्लीय है , आमाशय में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तो साक्षात् तीक्ष्ण तेज़ाब है जिसकी पीएच 2 या 3 होती है। पित्त क्षारीय है , अग्न्याशय के रस क्षारीय हैं। रक्त क्षारीय है , वीर्य क्षारीय है लेकिन पेशाब फिर अम्लीय है। भिन्न-भिन्न अंग , भिन्न-भिन्न उनकी अम्लीयता-क्षारीयता !

आदमी का जिस्म कोई बीकर या फ़्लास्क नहीं है जिसमें कोई रसायन का घोल पड़ा है। आपने लिटमस पेपर डाला और झट से अम्लीयता-क्षारीयता देखकर बता दिया कि आपको कैंसर होने की सम्भावना ज़्यादा है या कम।

कैंसर होने के कारण बहुत सारे हैं। अलग-अलग कैंसर अलग-अलग कारणों से होते हैं। आनुवंशिकी से लेकर तमाम रसायन और विकिरण तक अपना-अपना काम इन्हें उत्पन्न करने में देते हैं। केवल एल्कलाइन पानी पीने भर से अगर आप कैंसर से बचने की सोच रहे हैं , तो यह सोच बड़ी बचकानी है।

एल्कलाइन पानी और कुछ नहीं मैग्नीशियम व कैल्शियम जैसे खनिजों से युक्त पानी को कहा जा रहा है , जो आपकी-हमारी पिछली पीढ़ियाँ पीती रही हैं। हैण्डपम्पों-कुँओं-नदियों में यही जल तो मिलता आया है। लेकिन अब प्रदूषण के बढ़ने से और कीटाणुओं के संक्रमण से यह पानी पीने योग्य नहीं रहा। ऐसे में बाज़ार की कम्पनियाँ इसी तरह के पानी को शुद्ध रूप में आपको-हमको बेच रही हैं। यानी हैण्डपम्प-तालाब-कुएँ का पानी , लेकिन प्रदूषण व कीटाणुओं से मुक्त।

इस पानी में जो हलकी क्षारीयता है भी , वह कैसे कैंसर से आपको बचा लेगी , यह एकदम सोच से परे है। यह एल्कलाइन पानी पेट के तीखे तेज़ाब से मिलेगा न , रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप उसे खो बैठेगा। बस मामला ख़त्म। अब न कोई क्षारीयता बची और न उसका कोई कैंसर-कनेक्शन।

मोटी सी बात आपको यह समझनी है कि कैंसर-कोशिकाओं के कारण ( उनके आसपास के माहौल में ) अम्लीयता पैदा होती है , अम्लीयता के कारण कैंसर-कोशिकाएँ नहीं पैदा होतीं। और यह अम्लीय माहौल भी पूरे-के-पूरे शरीर में नहीं होता , केवल लोकल होता है।

कैंसर से बचाव का कोई एक तरीक़ा नहीं क्योंकि कैंसर कोई एक रोग नहीं है। न उसका कारण एक है , न उसका इलाज एक है। अलग-अलग अंगों में अलग-अलग कैंसर अलग-अलग कारणों से होते हैं।

बाज़ार आपको चूने की बोतल बेचकर चूना लगा रहा है , लगवाना चाहें तो लगवाइए। शरीर को नुक़सान नहीं , केवल आपकी जेब को है।

बेस्ट ऑफ़ लक !


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