कैसे करते हैं मोदी मंत्रिमंडल का चुनाव, क्यों बाहर हुए प्रभु, मेनका, उमा और राठौड़

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मोदी सरकार को बने हुए डेढ़ महीने हो चुके हैं, पर मंत्रिमंडल से बाहर किए गए मंत्रियों को अब तक समझ नहीं आया है कि उनसे क्या ख़ता हुई है. जिसकी उन्हें सज़ा मिली है. मोदी सरकार में शामिल कुछ मंत्रियों और निर्णय प्रक्रिया को समझने वाले भाजपा नेताओं से दिप्रिंट ने समझने की कोशिश की आखिर पीएम मोदी के फैसले का आधार क्या रहा ?

भाजपा सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री के अपने मंत्रिमंडल में मंत्री को लेने और निकालने के पीछे उनका जातीय और सामाजिक समीकरण, कार्य में निपुणता, चुनावी समीकरण मुख्य वजह होती है. प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के साथ उनकी केमिस्ट्री का भी चयन और विदाई में अहम रोल होता है.

उदाहरण के तौर पर बिहार से आने वाले भूमिहार नेता गिरिराज सिंह की बात करते हैं. पिछले पांच साल में गिरिराज सिंह ने कई बार पार्टी की फ़ज़ीहत कराई. लेकिन वे मोदी कैबिनेट-2 में भी राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री बने. इसकी वजह रही भूमिहार समुदाय का कोई बड़ा या मंझोले कद का नेता भाजपा में नहीं है, जो अपनी राष्ट्रीय पहचान रखता हो. बिहार की राजनीति में भूमिहार वोट को ध्यान में रखते हुए और बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए गिरिराज सिंह को पदोन्नति दी गई. यानि जातिगत समीकरण दूसरे कारणों पर भारी पड़े.

राधामोहन सिंह को मुख्यत: उनकी नॉन परफार्मेंस की वजह से हटाया गया. किसानों के देश भर में आंदोलन ख़ासकर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में कृषि संकट के कारण दिसंबर 2018 में भाजपा को अपनी तीन सरकारें गंवानी पड़ीं थी .

2018 में चुनाव से पहले मोदी को लगा कि राधामोहन सिंह उतनी डिलीवरी नहीं कर पा रहे हैं, तो अमित शाह ने वसुंधरा के समानांतर नए नेतृत्व को बढाने के लिए गजेन्द्र शेखावत की कृषि मंत्रालय में राज्यमंत्री के रूप में एंट्री कराई. वैसे राधामोहन सिंह पर मिट्टी की जांच करने वाली किट को उपलब्ध कराने वाली आंध्रप्रदेश की कंपनी नागार्जुन केमीकल को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगा था पर राधामोहन सिंह इन आरोपों का खंडन करते रहे. हर कैबिनेट फेरबदल के समय हटने वाले मंत्रियों में राधामोहन सिंह का नाम सबसे पहले लिया जाता था, पर वो हटाए नहीं गए थे.

अपने स्वास्थ्य के कारण अरूण जेटली पहले ही ऐलान कर चुकी थी कि वह इस बार मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होंगी पर सुषमा स्वराज ने ऐसा कोई ऐलान नहीं किया था. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक पहले कार्यकाल में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को कैबिनेट में लेना एक तरह से पीएम की राजनैतिक मजबूरी थी पर दूसरे कार्यकाल में प्रचंड बहुमत लाने के बाद मोदी के लिये कोई कहा अनकहा दबाब नहीं था. मंत्रिमंडल के चार टॉप मे जगह नहीं होने के कारण यह स्वाभाविक था कि वरिष्ठ सुषमा स्वराज सम्मानजनक विदाई लें.

शिवसेना में रहे सुरेश प्रभु को प्रधानमंत्री ने 2014 में शिवसेना की नाराजगी के बावजूद भाजपा में शामिल कर अपने कोटे से मंत्री बनाया था. भाजपा और शिवसेना में लोकसभा चुनाव जीतने के लिए युद्धविराम हो गया और उसकी भेंट चढ़े सुरेश प्रभु. सुरेश प्रभु को ड्राप कराने में उद्भव ठाकरे के वीटो ने काम किया, पर प्रभु पीएम मोदी के ‘गुड बुक्स’ से बाहर नहीं हुए और उन्हें जी -20 का शेरपा बनाया गया.

मेनका गांधी को बाहर करने के पीछे अमित शाह का व्यक्तिगत कॉल था. शाह के काम करने के तरीके में मेनका और वरूण बहुत सालों से फ़िट नहीं बैठ रहे थे. गांधी परिवार के आभामंडल में क़ैद और संगठन के लिए उपलब्ध न रहना मेनका की परफार्मेंस रिपोर्ट खराब करने के लिए काफी था.

शाह के क़रीबी और निर्णय प्रक्रिया की जानकारी रखने वाले एक भाजपा नेता के मुताबिक यूपी से शाह उन्हीं नेताओं को लाना चाहते थे. जो यूपी में सपा, बसपा गठबंधन के बाद भी भाजपा की विजय यात्रा को 64 सीट तक पहुंचाने में योगदान दिया हो. भाजपा नेता के मुताबिक जीत में भूमिका निभाने वाले ब्राह्मण समुदाय के यूपी भाजपा अध्यक्ष महेन्द्रनाथ पांडे को कैबिनेट में लेने के बाद यूपी कोटे से दूसरे मंत्री के लिए जगह नहीं बचती थी.

अगर परफॉर्मेंस की बात की जाय तो उड़ान स्कीम को देशभर में लागू कर जयंत सिन्हा का ट्रैक रिकार्ड उतना खराब नहीं था. अमित शाह के करीबी एक नेता के मुताबिक उन्हें मंत्रिमंडल में जगह पिता यशवंत सिन्हा की विरासत के कारण ही मिली थी और मंत्रिमंडल से जाने की वजह भी पिता यशवंत सिन्हा ही थे. जयंत को हटाने की वजहों में अर्जुन मुंडा को कैबिनेट में लिया जाना भी था. झारखंड विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आदिवासी बहुलता वाले राज्य में आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को कैबिनेट में जगह देकर जातिगत संतुलन साधने का प्रयास किया गया और इन दोनों वजहों के कारण जयंत को ड्राप करना पड़ा.

उमा भारती ने तो पहले ही स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया था, वैसे भी उनका परफारमेंस पीएमओ की नज़र में ख़राब था.

नाथूराम गोडसे पर विवादित बयान देकर पार्टी की किरकिरी कराने वाले हेगड़े की जगह लो प्रोफाईल रहने वाले प्रह्लाद जोशी को पीएम ने कर्नाटक कोटे से चुनना ठीक समझा.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सूचना प्रसारण और खेल मंत्रालय संभाल रहे राज्यवर्द्धन को जिस तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा था. उससे साफ़ था कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में वे अपने लिए बड़ी भूमिका की राह देख रहे थे.
दूसरे कार्यकाल में उन्हें जगह तक नहीं मिलना बहुतों को चौंकाया पर एक वरिष्ठ मंत्री के मुताबिक पीएम मोदी और शाह ने किसी दूसरी ज़िम्मेदारी के लिए राज्यवर्द्धन को चुन रखा हो. इससे इंकार नहीं किया जा सकता. वैसे राज्य में अभी संगठन के चुनाव होने बारी है और राजस्थान भाजपा के नए अध्यक्ष के तौर पर राठौड़ केन्द्र की पसंद हो सकते हैं .

इस बार बिहार भाजपा प्रभारी और गृहमंत्री अमित शाह शाह के करीबी भूपेन्द्र यादव की सलाह पर शाह ने 2019 लोकसभा चुनाव में बिहार से शत प्रतिशत जीत दिलाने वाले राज्य भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय को चुनना ज्यादा बेहतर समझा. राय की पकड़ बिहार की राजनीति पर बनी हुई है. जिसका फायदा आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को नित्यानंद राय और रामकृपाल दोनों यादव समुदाय से आतें है पर राय को भूपेन्द्र यादव की नज़दीकी का फायदा मिला .

दोनों नेता को उनके मंत्रालय में अपनी नान परफार्मेंस के आधार पर हटाया गया है.

एयरपोर्ट के निर्माण में शर्मा के जरूरत से ज्यादा रूचि लेने पर पीएमओ में की गई शिकायत भी उनके खिलाफ गई. शर्मा पर आरोप लगा कि शर्मा एयरपोर्ट डेवलेपमेंट का काम किसी विशेष कंपनी को दिलाने के लिए लॉबिंग कर रहे थे . पीएमओ और शाह तक शिकायत पहुचने के बाद उन्हें दुबारा मंत्रिपद देना ठीक नहीं समझा गया.

ये तो रहा जो ड्राप किए उनकी कहानी जिन्हें लिया गया अब उनपर भी एक नज़र

अरूण जेटली की सलाह पर पीएम मोदी ने पीयूष गोयल की जगह वित्त मंत्रालय निर्मला सीतारमण को सौंपा. इससे एक संभावना बची रहती है कि जेटली स्वस्थ होकर लौटे तो वित्त मंत्रालय में उनकी वापसी हो सकती है. जेटली के करीबी अनुराग ठाकुर को भी उनकी सलाह पर ही वित्त राज्यमंत्री का पद दिया गया. भाजपा सूत्रों के मुताबिक हरदीप पुरी की पदोन्नति भी जेटली की सलाह पर ही की गई है .

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सूचना प्रसारण ही एक ऐसा मंत्रालय था, जो चार मंत्रियों के बीच बदलता रहा. दूसरे कार्यकाल में पुरानी गलतियों से सीख लेते हुए पीएम ने ज्यादा परिपक्व जावड़ेकर के हवाले मंत्रालय किया. जावड़ेकर की सबको साथ लेकर चलने की शख़्सियत उनकी तरक़्क़ी का आधार बनी.

पिछले कैबिनेट में परफार्मर रहे गडकरी को रोजगार सृजन करने वाला सूक्ष्म लघु उद्योग मंत्रालय सौंपा गया, तो नरेन्द्र सिंह तोमर को उनके परफार्मेंस के कारण ग्रामीण विकास के साथ-साथ राधामोहन सिंह का कृषि मंत्रालय भी दिया गया. हर घर में जल पहुंचाने की महत्वकांक्षी योजना को राजस्थान के जोधपुर से जीते शेखावत के हवाले किया गया. वसुंधरा की जगह शेखावत को राजस्थान का भावी नेतृत्व के रूप में तैयार करने के उद्देश्य जल संसाधन का नया मंत्रालय बनाकर उन्हें ज़िम्मा दिया गया है .

सबसे आश्चर्य एंट्री रमेश पोखरियाल निशंक की हुई पांच साल से अज्ञातवास में चल रहे निशंक को स्वामी रामदेव के शाह से सिफ़ारिश के बाद इस बार भारी भरकम मंत्रालय मिल गया. निशंक के मुख्यमंत्री रहते भष्ट्राचार के आरोप लगने के बाद वो आलाकमान की नज़र से उतर गए थे. यही हाल अर्जुन मुंडा के साथ था. जमशेदपुर से चुनाव हारने के बाद अर्जुन मुंडा लगातार अज्ञातवास में थे, हालात यह थे कि जब अमित शाह रांची जाते थे तो संगठन की बड़ी बैठकों में उन्हें बुलाया तक नहीं जाता था, पर राज्य में विधानसभा चुनाव होने के कारण आदिवासी वोटबैंक को प्रतिनिधित्व देने की राजनैतिक चाह में मुंडा की लाटरी खुल गई.

कुल मिलाकर ड्राप किए और नए लिए गए मंत्रियों के चयन प्रक्रिया से जो तीन बातें सामने आती हैं कि परफार्मेंस सबसे बड़ा आधार रहा है, पर चुने जाने और निकाले जाने के लिए पर केवल वही आधार नहीं रहा है. कई सारे नॉन परफार्मर मंत्री भी बचे हैं. लेकिन उनके बचने की वजह मजबूत जातिगत समीकरण और पीएमओ के साथ तारतम्य बनाने की कला मुख्य वजह रही है. मसलन संतोष गंगवार, श्रीपद नाईक, फग्गनसिंह कुलस्ते, किशन पाल, रामदास आठवले, संजीव बालियान परफार्मर नहीं होते हुए भी जाति, राज्य और सामाजिक समीकरण के कारण बच गए और उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान मिला.

मंत्रिमंडल चुनाव में जो दूसरा दिलचस्प तथ्य दिखा है कि वह है विवाद पैदा करने वाले ज्यादातर मंत्रियों की छुट्टी हुई है चाहे वो अनंत हेगड़े हों या मेनका सिर्फ़ इस नियम में छूट गिरिराज सिंह को मिली है.

मोदी के काम करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया से तीसरा दिलचस्प तथ्य यह उभरता है कि मोदी दबाब में कभी मंत्रियों को ड्राप नहीं करते और बिना मीडिया इवेंट बनाए ड्राप होने वाले मंत्रियों को स्वाभाविक मौत मरने देते है. दबाब में केवल मोदी ने एमजे अकबर को हटाया था. निर्णय लेने की इस गोपनीयता के कारण मंत्री को अंत तक पता नहीं चल पाता कि वह अच्छा परफ़ार्म कर रहा है या बुरा और उसके राजनैतिक भविष्य में आगे क्या लिखा है.


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