सिनेमा घरों के सामने खड़ी हुई तीसरी समस्या

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मुंबई // गुणवंत सिंह बघेल 9967086023

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मनोरंजन की दुनिया इन दिनों खतरे के मुहाने है। नई फ़िल्में सिनेमा हॉल के बजाए ओटीटी पर रिलीज की जा रही है। अगर यही फ़िल्में सिनेमाघर में रिलीज होती, तो उससे सिनेमा हॉल वाले और उससे जुड़े कई लोग कुछ न कुछ कमाते! क्योंकि, एक फिल्म की रिलीज पर कई लोग आश्रित होते हैं। सबके हिस्से में कुछ न कुछ आता है! ओटीटी पर फिल्मों की रिलीज से सबका फ़ायदा शून्य हो गया। अगर बड़ी-बड़ी फिल्में इसी तरह ‘अमेजॉन’ या ‘नेटफ्लिक्स’ पर रिलीज होती रही, तो एक दिन मनोरंजन उद्योग से जुड़े कई लोग सड़क पर आ जाएंगे और फिल्म रिलीज के पूरे सिस्टम को गहरा झटका लगेगा! ओटीटी सिनेमाघरों का नया विकल्प बन गया! सिनेमा के सामने पहले दूसरा परदा बनकर टीवी खड़ा हुआ था,

अब ओटीटी ने उसे चोट दी है।  

सिनेमा घर सिर्फ फिल्म के प्रदर्शन का माध्यम नहीं होते, ये फिल्म रिलीज के पूरे सिस्टम का हिस्सा है। इसमें फिल्म के प्रोड्यूसर के अलावा फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर, बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों के फिल्म एक्ज़िबिटर या सिनेमा हॉल मालिक, फिल्म पब्लिसिस्ट, फिल्म पीआर और इन सबसे जुड़े तमाम लोग शामिल होते हैं। इसके अलावा सिनेमाघरों का पूरा स्टॉफ और कई ऐसे लोग होते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से फिल्म से अपना हिस्सा निकालते हैं। लेकिन, लॉक डाउन की वजह से इन सब लोगों की कमाई का जरिया खत्म हो गया। इस पूरे सिस्टम को कोरोना से बड़ा धक्का लगा है। नई फिल्मों को ओटीटी पर रिलीज करने से भी फिल्मों का रिलीज सिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ।

लॉक डाउन खत्म होने के बाद भी सिनेमाघरों को नई फिल्म लगाने की इजाजत नहीं मिली। कुछ दिनों तक तो सिनेमाघरों को पुरानी फिल्में ही चलानी पड़ रही है। क्योंकि, नई फिल्म रिलीज होने से भीड़ बढ़ेगी और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना मुश्किल हो जाएगा। हालांकि, समस्या यह है कि सिनेमाघर में पुरानी फिल्में देखने कौन आएगा?’ नई फिल्मों के प्रोड्यूसर की भी मजबूरी है, उसने फिल्म के लिए पैसा उधार ले रखा है और साथ में और भी खर्च हैं। ऐसे में अगर उनको ओटीटी से इस तरह फ़ायदा मिल रहा है, तो वे बेचकर निकल रहे हैं! उन्हें सिर्फ फायदे से मतलब है, लेकिन उससे पूरा सिस्टम प्रभावित हो रहा है।
ऑनलॉइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म आने से पहले फिल्म पहले थियेटर में रिलीज होती थी, तो निर्माताओं को उससे उसे लाभ मिलता था। फिर जब उसके टीवी या डिजिटल राइट्स बिकते थे, तो उसका अलग से पैसा बनता था। अब फिल्म को सीधे किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर रिलीज करने से आशंका है, कि इससे वह कमाई भी नहीं हो पाएगी, जो वास्तव में होना थी। सिनेमा से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि किसी भी प्लेटफॉर्म पर आप फिल्में देख लें, लेकिन सिनेमाघरों का कोई विकल्प नहीं है। सिर्फ हिंदी ही नहीं दक्षिण भारतीय फ़िल्में ज्योतिका की पोंमगल वंथल, अदिति राव हैदरी की फिल्म सूफियम सुजातयम और कीर्ति सुरेश की फिल्म पेंगुइन भी सीधे अमेज़ॉन प्राइम पर रिलीज हुई या हो रही है।
सिनेमाघरों में फिल्मों की रिलीज से सबसे ज्यादा राजस्व पैदा होता है, बनिस्बत किसी अन्य माध्यम के! लेकिन, ये समस्या जल्दी खत्म नहीं होने वाली नहीं है। किसी प्रोड्यूसर की अपनी मजबूरी होगी कि उसे ऐसा करना पड़ा! हो सकता है कि उसे लगता हो कि वह रुक नहीं सकता, फिल्म पूरी होने के बाद भी यदि रिलीज नहीं हो रही तो उसे नुकसान हो रहा है! बड़े डायरेक्टर, एक्टर या कोई बड़ा प्रोड्यूसर इस बारे में लगता नहीं कि जल्दी नहीं सोचेंगे। क्योंकि, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उतना राजस्व पैदा नहीं हो सकता, जितना सिनेमाघरों में फिल्म को रिलीज करने से होता है। सिनेमाघरों को न तो दर्शक छोड़ने वाले हैं, न एक्टर और न डायरेक्टर-प्रोड्यूसर। किंतु, अभी ऐसे हालात नहीं  कोई इस बारे में सोच-विचार भी करे।
लॉक डाउन में सबसे पहले ओटीटी पर रिलीज होने वाली बड़ी फिल्म थी अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना कि ‘गुलाबो सिताबो’ जिसे औसत  सफलता मिली। उसे कितने लोगों ने देखा! रैपर बादशाह के नए गाने ‘गेंदा फूल’ को यूट्यूब पर 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने देखा! इतने दर्शकों ने ‘गुलाबो सिताबो’ नहीं देखी। ऐसे में जब फिल्म को डिजिटली रिलीज किया जाएगा, तो सफलता हमेशा संदिग्ध रहेगी। बड़ा पर्दा वह है, जहां जादू होता है, जहां स्टार जन्म लेते हैं। ओटीटी या वेब पर सितारों का जन्म नहीं होता। किसी नई फिल्म को देखने के लिए जब 500 लोग किसी सिनेमा घर के बाहर लाइन में लगे होते हैं, तब जाकर एक स्टार का जन्म होता है। टुकड़ों में फिल्म देखकर सोशल मीडिया पर उसकी समीक्षा करने से मकसद पूरा नहीं होता!
लोगों का मानना है कि आने वाला समय बहुत अनिश्चितता भरा है। ऐसी स्थितियाँ कब तक रहेंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता! सवाल यह है कि इन स्थितियों में कोई प्रोड्यूसर कितने समय तक अपनी फिल्म को रोककर रखेगा? संक्रमण की यही अनिश्चितता रही, तो क्या दर्शक उतनी सहजता से सिनेमाघरों का रुख कर पाएंगे, जितनी सहजता से इस महामारी के आने से पहले किया करते थे? इस सवाल का जवाब फ़िलहाल मिलना मुश्किल है। लेकिन, ओटीटी के प्रति दर्शकों ने सिनेमा की दुनिया को खतरे में जरूर डाल दिया। सिनेमा के बाद टीवी और अब मोबाइल के स्क्रीन में फ़िल्में कैद हो गई!


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