यादों के साये में सिमट जाएगी पुरानी विधान सभा : प्रलय श्रीवास्तव

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ANI NEWS INDIA @ http://aninewsindia.com

भोपाल।  मुझे याद है 3 मार्च 1981 का वो दिन जब मै अपना नियुक्ति पत्र लेकर विधान सभा  के मुख्य द्वार पर खड़ा   इस भव्य और ऐतिहासिक इमारत को निहार रहा था । सोच रहा था कि न जाने क्या सोचकर इसे बनवाया गया होगा । पहले मिंटो हाल फिर हमीदिया कालेज और बाद में 17 दिसम्बर 1956 से विधान सभा  भवन में तब्दील इस इमारत का चप्पा चप्पा अपनी कहानी खुद कहता है ।

1956 के बाद 40 वर्ष तक विधानसभा के रूप संचालित यह धरोहर लगातार मध्यप्रदेश का भविष्य तय करती रही । डी पी मिश्र, गोविंद नारायण सिंह, भगवत राव मंडलोई, प्रकाश चन्द्र सेठी, कुंजीलाल दुबे जैसी अनेको महान हस्तियों के कृतित्व का यह भवन गवाह रहा है । साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक तक मध्यप्रदेश की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बिंदु बन चुके इस भवन ने कालांतर में पहली बार विधायक बने  अनेक विधायको को भविष्य का धुरंदर नेता भी बनाया । 

 प्रलय श्रीवास्तव
इनमे प्रमुख रूप से  श्यामाचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह, वीरेंद्र कुमार सखलेचा, कैलाश जोशी, सुंदर लाल पटवा, मोतीलाल वोरा  शामिल है ।भवन के सामने बना एमएलए रेस्ट भी तब राजनैतिक उठा पटक का अखाड़ा हुआ करता था । संविद सरकार बनाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही । दिन तो क्या राते भी राजनीति का ताना बाना बुनने में निकल जाती । मुझे भी बाल्य अवस्था मे तीन नम्बर के ब्लाक के 17-18 रूम में रहने का मौका मिला था ।

1981 से 1991 यानी दस साल मैने यहाँ नौकरी की । बिल्डिंग का कोना कोना देखा । ऐसी मजबूती फिर और किसी भवन में देखने को नही मिली । 1980- 83 के धाकड़ स्पीकर यज्ञदत्त शर्मा को भला कौन भूल सकता है । वे ही थे जिन्होंने भवन के सामने की सड़क को बंद करवाकर नेहरू उद्यान को विधानसभा परिसर में शामिल करवाया । फिर बाद में  पड़ोस में लगने वाले लॉ डिपार्टमेंट के भवन और भूमि को भी परिसर में शामिल करवाया । जब नई विधान सभा की बात आई तो अरेरा हिल्स पर भूमि का आवंटन उन्ही के प्रयासों के देन है । मुझे चार स्पीकर यज्ञदत्त शर्मा, रामकिशोर शुक्ल, राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल और ब्रजमोहन मिश्र के साथ काम करने का सुअवसर मिला, जो मेरे केरियर के अहम पड़ाव भी रहे।

1989 से 1991 तक जब मुझे पीआरओ का दायित्व सौपा गया तब मेरा कक्ष भवन में प्रवेश करने पर प्रेस रूम से लगा तथा लॉबी के समीप होता था, जो तत्कालीन विधायको और पत्रकारों की  मेल-  मुलाकात का केंद्र भी था । प्रेस रूम में मात्र 64 कुर्सी ही थी।उस दौरान सत्र के समय प्रवेश पत्र को सभी लोग मठ्ठा पास बोलते थे , क्योंकि यंहा मिलने वाला मठ्ठा बेहद टेस्टी और सस्ता था , इसके अलावा चिकन और फिश की अलग शॉप लगा करती थी । अंदर सदन की गर्माहट के बाद लंच में इन स्थानों पर अच्छी खासी भीड़ होती । तब सदन की सारी गैलरी न सिर्फ भरी होती बल्कि महवपूर्ण चर्चाओं के समय तो पास बनना बन्द हो जाते । 1990 में पहली बार विधायक बने आज के मुख्यमंत्री  शिवराजसिंह चौहान अक्सर लंच टाइम में पुस्तकालय में अध्ययन करते मिलते । उनकी इसी शैली ने उन्हें संसदीय विषयों का जानकार और बेहतर वक्ता भी बना दिया ।

डियूटी के बाद अनेको बार देर रात तक सदन चलता और हम लोग गैलरी में बैठकर देखते । इस दौरान मैने कई बार अविश्वास प्रस्तावों पर सुबह 3- 4 बजे तक हुई चर्चाओं को सुना । अविलम्बनीय लोक महत्व के विषय और काम रोको प्रस्ताव यानि स्थगन पर भी हुई चर्चाएं लम्बी और सार्थक चलती । सत्र में भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रमो से प्रायः माहौल और खुशनुमा हो जाता । मेरा सौभाग्य रहा कि मैं विधानसभा की सिल्वर जुबली और पीठासीन अधिकारियों     के राष्ट्रीय सम्मेलन का न सिर्फ साक्षी बल्कि सहयोगी भी रहा ।

जनता शासनकाल में इंदौर के नेता सुरेश सेठ के नेतृत्व में प्रदर्शन को भी भला कौन भूल सकता है , जिसमे ऊँठ, हाथियों आदि का भी इस्तेमाल हुआ था ।नए भवन में जाने से कुछ साल पहले हुए चूड़ी चप्पल कांड ने इस भवन के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ दिया था । आज जब भी इस इमारत के सामने से निकलता हूँ तो सोचता हूँ मेरे और यहाँ काम कर चुके अधिकारियों- कर्मचारियों के अलावा   वे लोग भी इस धरोहर को याद करते होंगे जो कभी विधायक के रूप में इसकी शान हुआ करते थे ।


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